विटामिन डी की पूरी जानकारी – Vitamin D information

विटामिन डी नामक यह विटामिन भी विटामिन ए की तरह ही तेल के रूप में होता है  चूँकि इस विटामिन की कमी से Rickets (रिकेट्स) नामक रोग होता है इसलिए इस विटामिन को ‘एन्टीरेकेटिक विटामिन’ (antirachitic vitamin) भी कहा जाता है। यह विटामिन वसा में घुलनशील होता है | विटामिन डी का मनुष्य शरीर में स्वत: निर्माण होता है, इसके निर्माण के लिए सूर्य किरणों की आवश्यकता होती है । अक्सर होता क्या है की शरीर में त्वचा अर्थात स्किन के नीचे एक विशेष रासायनिक पदार्थ उपस्थित रहता है जिसे ‘डीहाइड्रोक्सी कोलेस्ट्रोल’(Dehydrocholesterol) कहते हैं । यह पदार्थ सूर्य की किरणों में निहित शक्ति से, हमारे शरीर में Vitamin D के रूप में परिणित हो जाता है ।

विटामिन डी की जानकारी

विटामिन डी की विशेषताएं (Features of Vitamin D in Hindi):

यद्यपि जैसा की हम उपर्युक्त वाक्य में बता चुके हैं की इस विटामिन अर्थात विटामिन डी का निर्माण शरीर में स्वत: होता रहता है लेकिन खान पान अर्थात भोजन से भी इसका समबन्ध है | विटामिन डी के बारे में और विस्तृत तौर पर समझने के लिए हमें इसकी विशेषताओं पर प्रकाश डालना होगा तो आइये जानते हैं इस विटामिन की मुख्य विशेषताएं क्या क्या हैं |

  • पशुओं से प्राप्त खाद्य पदार्थ जैसे मक्खन, घी, अंडे इत्यादि में यह विटामिन पाया जाता है |
  • साग सब्जियों में इस विटामिन की उपलब्धता नहीं रहती है |
  • मछली के तेल में विटामिन डी की सर्वाधिक मात्रा पायी जाती है अर्थात विटामिन डी की कमी को पूर्ण करने का बढ़िया रास्ता cod liver oil का ही सेवन है |
  • विटामिन डी एक स्थायी तत्व है जिस पर उष्णता अर्थात गर्मी या खाना बनाने की विभिन्न विधियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है | कहने का आशय यह है की जिन खाद्य पदार्थों में विटामिन डी पाया जाता है फिर उस पदार्थ को आप किसी भी विधि से पका लें लेकिन उष्णता या गर्मी से उस पदार्थ में विटामिन डी नष्ट नहीं होता है |
  • Vitamin D की एक अन्तर्राष्ट्रीय यूनिट 025 माइक्रोग्राम केलसिफिराल में निहित अस्थि विकृति प्रतिकारक क्षमता मानी गई है ।
  • मुहं द्वारा आहार लेने पर विटामिन डी का आत्मीकरण होता है लेकिन इसके लिए इस विटामिन का आँतों में अवशोषण के लिए पित्त की उपस्थिति अनिवार्य होती है ।
  • लिक्विड पैराफीन या दूसरे मिनरल तेलों में विटामिन डी के घुल जाने से यह आँतों से बाहर निकल सकता है ।
  • विटामिन डी मनुष्य एवं अन्य जीवों में कैल्शियम और फॉसफोरस को रुधिर में नियमित रूप में बनाये रखने का काम करता है |
  • Vitamin D दाँतों और हड्डियों को मजबूत करने के लिए बेहद जरूरी होता है ।
  • बच्चों की हड्डियों को मजबूत करने के लिए विटामिन डी अनिवार्य होता है |

Vitamin D की कमी का मनुष्य जीवन पर प्रभाव:

यदि किसी बच्चे में Vitamin D की कमी हो जाती है तो उस बच्चे की हड्डियाँ नरम एवं कमजोर हो सकती हैं कहने का आशय यह है की विटामिन डी की कमी हो जाने पर बच्चों की हड्डियां नरम और कमजोर हो जाती हैं तथा कमजोरी के कारण हड्डियां टेढ़ी हो सकती हैं । जिसके परिणामस्वरूप बच्चे  कुबड़े हो सकते हैं और बच्चों के दाँत निकलने में भी अनावश्यक देरी हो सकती है | यह बच्चों में तब होता है जब बच्चों को सूर्य की रोशनी या धूप पर्याप्त मात्रा में न मिल पा रही हो अर्थात धूप पर्याप्त मात्रा में न लेने से विटामिन डी की कमी हो जाती है । विशेषकर इस विटामिन की कमी से स्त्रियों में  हड्डियां कमजोर हो जाती हैं । वयस्कों में भी हड्डियाँ नरम हो जाने पर प्रारम्भ में कमर और कुल्हों में दर्द होता है जिसके कारण रोगी को चलने में कष्ट हो सकता है, रोग बढ़ जाने पर मरीज की पेडू की  हड्डियां टेढ़ी और कुरूप हो सकती हैं | इसके परिणाम स्वरूप मरीज को सीढ़ियों पर चढ़ने में बेहद कष्ट हो सकता है तथा हड्डियों में दर्द भी हो सकता है ।

विटामिन डी की कमी से होने वाला रोग :

हालांकि विटामिन डी की कमी से अनेक छोटे मोटे रोग उत्पन्न हो सकते हैं लेकिन इनमे जो सबसे प्रमुख रोग है उसका नाम है रिकेट्स (Rickets) यह Vitamin D से समबन्धित यह बीमारी संसारभर अर्थात पूरे विश्व में फैली हुई है इस रोग से अधिकतर यूरोप एवं अमेरिका के बच्चे अधिक प्रभावित हैं | लेकिन गरम देशों जैसे भारत, अफ्रीका, चीन एवं एशिया के अन्य गरम देशों में यह रोग कम पाया जाता है । जहाँ तक भारत चीन, जापान इत्यादि का प्रश्न हैं इन देशों में हड्डियों से समबन्धित Osteomalacia नामक रोग अधिक पाया जाता है वह भी विशेष तौर पर इस रोग से ऐसी स्त्रियाँ ग्रसित होती हैं जो अधिकतर परदे में रहती हैं | किसी भी प्राणी के लिए Vitamin D की एक निश्चित मात्रा बेहद आवश्यक होती है । बच्चों और युवाओं को स्वस्थ रहने के लिए रक्त में 66 से 165 यूनिट विटामिन डी और एक युवा पुरूष को स्वस्थ रहने के लिए विटामिन ‘डी’ की औसत दैनिक आवश्यकता लगभग 500 से 1000 यूनिट होती है | इस दैनिक आवश्यकता को किसी भी मनुष्य द्वारा 0.025 मिलीग्राम केलसिफेराल, 3 से 6 बूंद हैलीबुट लिवर ऑयल, 2 चम्मच Cod Liver oil 1 पाव मक्खन या 1 गैलन दूध इनमे से किसी एक का प्रयोग करने से हासिल किया जा सकता है |

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